Tuesday, 1 October 2013

मगर फिर भी ..

यूँ ही कुछ सुकूं तो है मगर फिर भी ,
तस्वीर पर नजर तो है मगर फिर भी .

चांदनी से लग रहा है चाँद था यहींकहीं 
दीखता नूर है नजर में मगर फिर भी .

कुछ कहना चाहते हो मुझसे , कह दो 
मानना चाहते हैं तुम्हारी मगर फिर भी.

कैसे समेटूं मैं शब्दों का बंधन भेज दो 
आवारगी छूती नहीं यूँतो मगर फिर भी.

टूट न जाये बाँध जो लपेटे है लहरों को
यूँ तो किनारा मिल गया मगर फिर भी .

तैरने की कोशिश बकाया डूबने का डर
बिन पतवार है कश्ती ....मगर फिर भी .- विजयलक्ष्मी 

हर अंदाज जुदा है दुनिया से मग

हर अंदाज जुदा है दुनिया से मगर ...
अब लेना क्या है दुनिया से मगर  ... 

कहे तो बोल उठेंगे होठ ,है बेचैनी ...
कह दिया कितना नजरों से मगर ...

तिश्नगी नजरो की उतरी  मुझमे ..
न मिटेगी प्यास उम्रभर ये मगर ..

कोई रास्ता नहीं मंजिल है सामने.. 
कदम भर सही है फासला ये मगर ...

कुआ कहूं या प्यासा बता क्या कहूं ..
प्यास ही बह उठी दरिया सी मगर ...- विजयलक्ष्मी 

कयामत से पहले कयामत न बुला

रहने दे कयामत से पहले कयामत न बुला ,
बिन मौसम डाली पर यूँ कोई गुल न खिला.

महज अफसाना न समझ हकीकत बयाँ को 
दास्ताँ वक्त सुना देगा यूँ मन वीणा न बजा .

प्रस्फुटित हर अहसास मौज हुआ जाता है 
पत्थर सा तसव्वुर ही सही मुझे बुत न बना.- विजयलक्ष्मी 

नजर ख्वाब की फितरत बता गयी

वादा ए लुत्फ़ में जांनिसारी ख्वाबों की ,
जिन्दगी को रूमानी बना गयी ..

ख्वाब कोई तन्हा नहीं है तुम्हारा मुझसे 
तुम्हारी हर अदाकारी बता गयी .

वाबस्ता हुए गुल खूंरेज हुए थे क्यूँ भला
तलवार दुधारी थी वो जता गयी ..

जिस दुनिया पे मालिकाना हक रखते हो
गुजरी रात वही बात बता गयी ..

इन्साफ की तराजू लिए खड़े रहते हो तुम
नजर ख्वाब की फितरत बता गयी .- विजयलक्ष्मी 

तेरी तस्वीर से गुफ्तगू परेशां तुम..




तेरी तस्वीर से गुफ्तगू परेशां तुम, दर्द होता है ,

दर्द तुम्हारा बढ़े अपना मौसम भी जर्द होता है .

मौज ए मिसल सबा में थे रंग सब तुम्हारे ही 

मुतमईन तुम नहीं गर तो हमे भी दर्द होता है 

किसी और का हाथ दूर ख्वाब नहीं थाम सके

उड़ान न उड़े तुम्हारे संग हम बेडा-गर्क होता है 

खेमे भी थे तुम्हारी यादे हिस्सा ए कायनात 

झंझा उड़ाकर हमे कर न दे जुदा , दर्द होता है 

इन्तजार यही रहा एक आवाज देदो मुझे तुम 

शुक्रिया तुमने मौन तोडा बता क्या खर्च होता है .

.- विजयलक्ष्मी