Sunday, 1 September 2013

सूरज का उजाला जिंदगी दे जाता है धरा को
















शबनमी मोती है खिले आंगन में मेरे .
गुलों के नाम पर शहादत लिख सकोगे उनकी ?
लौट लौट कर खिलती है हर बार यूँही ,
मुस्कुराने की कोशिशे... मालूम है मिटना है उसे भी ,
उम्र का तकाजा नहीं ,दुआओं में उन्हें भी खिलने का मौका दे डाले ..
जो मौत के करीब होकर भी जीने ख्वाहिश पाले हैं आज भी ,
वात्सल्य का रंग हर रंग से अलग है उसमे मिलावट नहीं होती ,
पाकीजगी होती है शरारत नहीं होती .
सूरज का उजाला जिंदगी दे जाता है धरा को ,,
खिला जाता है इन्द्रधनुषी रंग औ महका देता है उपवन .-विजयलक्ष्मी 

भूल गये न सब दामिनी को

मीडिया मण्डी हो गया ...बिलकुल सच और वकालत भडवागिरी नहीं समझे न कैसे समझोगे ...सब आसाराम की खबर सुन रहे हो ..जिसे सौ से हजार बार ..बार बार दिखाया जा रहा है ..और बेवकूफ हिन्दुस्तानी खुश है सुनकर ..
.क्या एक बार से मन नहीं भरा ....
भूल गये न सब दामिनी को ...तब तो मोमबत्ती लेलेकर मार्च निकाला था ...पकड़ो और सजा दो के खूब नारे लगाए थे ...आज क्या हुआ ..बस इतना ही गुस्सा था ..मात्र तीन वर्ष की कैद ..!!वाह रे हिंदुस्तान ..दरिंदगी पूर्ण भयानक मौत की सजा मात्र तीन वर्ष ||
और तीन साल बाद ...फिर आजाद ..बेख़ौफ़ ...उन्ही रास्तों पर ..वाह री अदालत और तुम्हारे निर्णय ..सच में जो लोग खुद को साफ़ बचाना चाहते हो उन्हें कुछ वक़्त कोर्ट की कार्यवाही देखने जेब भरकर जाना ही चाहिए .....ज्यादातर मामलों में वकील-पुलिस-जज मिल कर क्या तोड़ - काट निकालते है ... (भ्रष्टाचार ,बलात्कार ,घूसखोरी ,मर्डर) सभी का सीधा रिश्ता मात्र निपुणता से ही होता है

....
फिर वही वहशी दरिंदे भूखे भेडिये से ,
नोच लेते है यूँ तो नजर से तन और मन को ,
जाने कब इंसान की शक्ल में कहाँ पर मिल जाये ,
स्वरक्षा का हुनर जरूरी है आजकल ,
न मालूम कब ये हुनर काम आ जाये ,
रौंदते है लाज देश की तोड़ते है स्त्री सा गहना ,
जिस रूप को पूजते है माँ बना कर घर में सभी ,
नहीं सोचते लुटते हुए बहन हों सकती है और कहीं पर तेरी भी ,
न हों कल तुम्हारी माँ का भी ये हाल हों ,
तब देखना होगा क्या करते हों हाल उन दरिंदों का सोचना ,,,
क्यूँ न कर दिया जाये वही हश्र इनका भी ..
क्यूँ दया की भीख फिर ये मांगते ..
क्यूँ नहीं इनको भरे चौराहे टांगते ..
देकर फांसी का फंदा गलों के माप का ..उतार दो भूत जो चढा है पाप का ,
क्यूँ दया फिर मांगते भेजते है अर्जी ....
क्या जिंदगी किसी और की बस है बाकी फर्जी
क्यूँ न उतार दे कटार पार शरीर के ...
कर दिए टुकड़े जिन्होंने इंसानी जमीर के ..
क्या कहूँ है इंसानियत जिन्दा है बाकी कहीं ...
सोचकर देखना ..
क्या एक ही मछली पूरे तालाब को गंदा करती नहीं .- विजयलक्ष्मी

भारत के पहले विशिष्ट व स्वदेशी निर्मित रक्षा उपग्रह जीसैट-7



185 करोड़ की लागत से निर्मित भारत के पहले विशिष्ट व स्वदेशी निर्मित रक्षा उपग्रह जीसैट-7 का फ्रेंच गुयाना के कौरू अंतरिक्ष केंद्र से सफल प्रक्षेपण 30 अगस्त 2013 को किया गया. इस उपग्रह को रूक्मिणी नाम दिया गया. अब तक यह तकनीक केवल अमेरिका, र
ूस, फ्रांस, ब्रिटेन और चीन के पास थी. ....भारत छठां देश है, जो इस समूह में शामिल हो गया
रक्षा उपग्रह जीसैट-7 के प्रक्षेपण का उद्देश्य इस उपग्रह के प्रक्षेपण का उद्देश्य भारत की समुद्री सीमा की निगरानी क्षमता में गुणात्मक सुधार करना है. इस उपग्रह द्वारा सितंबर 2013 के अंत तक कार्य करना शुरू किया जाना है. स्वदेश निर्मित इस संचार उपग्रह का इस्तेमाल भारतीय नौसेना द्वारा किया जाना है.
इसके प्रयोग से अपनी सेना को अधिक क्षमतावान बना सकेंगे गोपनीयता के साथ ..भारत माँ के सपूतों को बधाई !!- विजयलक्ष्मी

देश गम्भीर आर्थिक संकट में है |



मन्नू को समझ आ ही गयी ...देश गम्भीर आर्थिक संकट में है |

वित्त नैया के खिवैया अर्थशास्त्री ने भी बदला अपना सुर..कर्ज वसूली में नरमी बरते बैंक| 
सरकार की गलत नीतियाँ जिम्मेदार ..आइना दिखाना जरूरी |
रूपये के नाम दो रिकार्ड ...गिरा भी 68.81 $ गहरे गढ्ढे में उछला भी 225 paisa ऊँचा |
खाद्य सुरक्षा बिल असमय लगी गुहार ....हाय हाय जनता करे पुकार ...
निष्कर्ष निकला अजब ....सबकुछ महंगा राशन की दुकान पर मिलेगा सस्ता सामान |
नवीन सुचनानुसार ...किसान बारिश और धूप में नहीं करेंगे काम |
सरकार करा तो रही है सस्ते राशन का इंतजाम | 
किसानों को भी चाहिए अब थोडा सा आराम |... 
एक बात पूछूं समझ न आई..अब राशन का इंतजाम कहाँ से करेगी माई !!- विजयलक्ष्मी

रूह पर उकेर दिया समय की छेनी ने एक नाम

रेत होते हम सागर किनारे की 
पानी की लहरे मिटा देती निशाँ तुम्हारे 
सहरा की रेत में ..हवा उड़ा देती निशाँ जिन्दगी के हमारी 
नदी होते गर बह गये होते संग जलधार के 
समन्दर का खारापन नयनों में रोक लिया है ..सुना नमक गला देता है जड़े भी 
क्या बताऊँ ...सहेजा है कैसे ..
उल बनके खिलने की चाहत को काँटों से खौफ हुआ 
दीप को जिन्दगी के तूफानों का खौफ है 
अब दरकार नहीं कोई ...खुद को पत्थर बना लिया 
तुमने कागज समझ जो हस्ताक्षर किये ..लाल स्याही से हमारी
लहू था हमारा बहता है मुझमे ही,
रूह पर उकेर दिया समय की छेनी ने एक नाम ..
.. ...
सुन रहे हो ...
जिन्दगी के बाद भी रहेगा साथ ..
मेरा खुदा बन कर ईमान ..!!- विजयलक्ष्मी