Tuesday, 6 November 2012

गमले के पौधे मोहताज होते है माली के ..

गमले के पौधे मरते है मगर लापरवाही से माली की ,
बुराई उनमे नहीं होती उन्हें मिलती है सिमित जमीं ,
मगर खिलते भी वही तरतीब से है सलीके के साथ ,
बिन तरीके चलने वालों को लोग आवारा कहा करते हैं .
जंगली जानवर बहुत शातिर होते है जीवन के खेल में,

शातिरी सीख लेते है मगर जंगलीपन साथ चलता है ,

कुछ पौधे मर जाते है जिंदगी की शुरुआत में और ...
सच है जिंदगी इतनी आसान भी नहीं हों तुम ...
हर दिन बसंत सा होता है और हर पल मौत का खतरा ..
खुशी भी जहाँ है और गम भी लम्हों के साथ चलता ..
तितलियाँ निहारती है पल भर को ही सही चली आती है खुशियाँ बांटने
यही बहुत है गमले के पौधे को खुशी में नम कर लेने को आँखें ..
और जी लेने को अहसास जिंदगी तुम साथ हों मेरे ..
हम बोनसाई ही सही मगर खिल लेते है कुछ देर ही सही ..
चाहो तो जिन्दा रहेंगे हमेशा ...जब चाहो मार दो ..
गमले के पौधे मोहताज होते है माली के ..-- विजयलक्ष्मी

क्या पाकीजगी कम थी ..

बिखरे से ख्वाब ,सिमटते से खत आये है ,
जिंदगी फैली है दूर तलक अहसास आये हैं ,
दर्द कहाँ छिपा दूँ भेज दे तन्हाई अपनी ...जरूर बहुत है उसकी ,
आज विश्वास दरका है और जिंदगी खो रही है ..
डूबकर मरती नहीं समन्दर में ..
एक लहर आये और हम खो जाये ...चैन शायद सभी को आ जाये ,
हम बंट गए क्यूँ ,क्या पाकीजगी कम थी ..
या हमारी नजर भली नहीं थी ....
हम खतावार है ख्वाब संग चल दिए क्यूँ ...
सजायाफ्ता मुजरिम से ...अब दरकार ए सजा होगी ,
उन रातों की नमी नयनों में चली आई दूर तलक ...
जाना ही होगा सफर लम्बा हुआ जाता है अब मेरा .-विजयलक्ष्मी
 

दुनिया मिटेगी नहीं ...

सत्य कटु होता है ,
पूरा ही जीने दे सदैव ..जरूरी नहीं ,
कभी कभी बाँट देता है दो टुकडो में ...
क्या जन्म और क्या समापन ...वक्त है ये ..
सुना था योद्धा पंचांग नहीं बांचते ...
हाँ वक्त ऐसा ही योद्धा है ...सबके बांचे गए पंचांग ...पलट देता हैं पल में ,
और चल देता सब समेट कर अपने बाहुबल में ,,,
सत्य बदलता नहीं फिर झूठ साबित हों जाता है ...
सत्य बोलना और सत्य में जीना ....क्या सम्भव है ?
सत्य बदलता कब है 

,...
ये खेला है जीवन ,सब नश्वर मगर सबसे पहले जाना है खुद मुझको ..
दुनिया मिटेगी नहीं ..
पौधे गमलों के सूख जाते है निरंतरता के बिन मगर ...
जंगली पौधे मनमौजी से मरते नहीं ,कई बार उखाडो जमीं से तब भी ,
बरसात के इन्तजार करते हैं ,
सोखते है धरा से जल और लड़ते ही रहते हैं जीवन भर ...
बाकी सब तो चलता ही रहेगा ...जीवन जीना जो ठहरा ...
गगन धरा मिल गए उस छोर जहाँ कोई नहीं मिलता .- विजयलक्ष्मी

कलम जब करती बात है ..

शब्द जीवन डोर थामे हों ,
रिश्ते कोमल से कच्चे धागे हों ,
जब जीवन बनी एक आस हों ,
शब्द जीवन के खुद के अहसास हों ..
दूरियों में नजदीकियों कि दरयाफ्त हों ,
जीवन खेला जीवन के साथ है ,
कलम जब करती बात है ,
शब्द बोलते हों कानों से गुज उतर कर भीतर मन के ..
बस यही है करतब हैं शायद इस कलम से ..--विजयलक्ष्मी

कुछ और बचा हों दे जा ....

जिन्हें शौंक हुआ रिश्तों के बदलने का वोही बात बनाते नजर आते है ..
ईमान वाले ही मौत के घाट उतर जाते हैं ...
मतलब की दुनिया हुयी किस कदर जब चाहे बुत कर जाते है ,
भरोसा करें किसका अपने ही इल्ज़ाम लगा जाते हैं ,
मौत के दर पहले ही मारने पर उतारू हों जाते हैं ...
चैन जब नहीं मिलता .. कब्र के मुर्दों को आवाज लगा जाते हैं ..
वाह री सियासत की दुनिया ..अब हर रिश्ते ही सिंथेटिक नजर आते हैं ,
अच्छा हुआ कलयुग चल रहा है ...

वक्त को नापो तो जैसे  राम खुद सीता में आग लगा जाते हैं ...
हर वफा के किस्से को ...बेवफाई का का इल्ज़ाम लगा जाते हैं ,
कोई मर भी जाये चाहे बदनीयती का इनाम दिला जाते हैं ,
किया कुबूल ये तोहफा भी तेरा ,कुछ और बचा हों दे जा ...
हम फिर भी तुझे हर इल्ज़ाम से बरी किये जाते हैं .-- विजयलक्ष्मी