Thursday, 1 September 2016

सुधार जरूरी है,,,संस्कारों में ......

सुना दीवारों के कान ,है हर हाथ में खंजर , 
अपने से तन्हा सफर का खूबसूरत है मंजर.
जीवन नदी में घडियाल बैठे उदरपूर्ति को 
हर भूल शूल बने ज्यूँ चुभे नंगे पाँव कंकर
विष पीकर बाँट अमृत देव भये शिवशंकर
---- विजयलक्ष्मी



किसने बनाई अपने देश की जख्मी तस्वीर ,पता करो,
पटेल भगत सुभाष से बड़ी है कौन सी लकीर, पता करो,
औरंगजेब ने राष्ट्रहित में कब उठाई शमशीर , पता करो
किस माँ का लाल वो जिसके हिस्से कश्मीर, पता करो
रणभूमि में किसकी बिगड़ने वाली है तकदीर पता करो
क्यूँकर लहू से रंगती है कलम बनकर जंजीर ,पता करो
हाँ,, आन बान मान पर चलते जीवन के तीर, पता करो
दुश्मन की घातें,, गिद्धों की बातें, दिल चीर , पता करो ||
 --- विजयलक्ष्मी



लिहरे लिहरे ममता का आंचल और डरती सहमी सी ये अँखियाँ ,
कैसे आंचल में लाज छिपा लूं ....छितरी छितरी सी है रतियाँ ..
कौन कपट किस राग संग में ..दर्द ही दर्द ,क्यूँ बैरन हुयी बतियाँ ..
रैन कटीली दिन जहरीले वक्त सी चलती है अब कैसी ये छुरियाँ ..
आँसू तेरे उन दो नैनों के जैसे नाजुक सी पलकों पर बहती नदियाँ 

जा बस रहने दे अब ,छोड़ दिया दर्द की सुरीली सी हुई रागिनियाँ "
.-- विजयलक्ष्मी




कैसे कटे रात अन्धेरा घनेरा ,
न जाने खबर कोई कब छलक जाये ||
वो धरती सितारे चंदा चाँदनी ,
न जाने सब किस पल महक जाये ||

मोती पलक से घूंघट उठाकर ,
निकल कर कपोलों पर ढलक जाये ||
गम या खुशी उनको पता क्या ,
न जाने कौन कौन रंग में रंग जाये ||
ए नगमा ए गम के तराने सुन ,
खुशी को किसी की न नजर लग जाये ||
---..विजयलक्ष्मी


रंग ,बेबसी के संग ,,
कैसे समझे कोई ...पल पल मरते पल को पलको पर ठहर जाता है जो ,
जख्म तन के भर जाते है पर मन के जख्मों का क्या ,
वारदात ....काश ...!महज एक वारदात होती तो अच्छा था ,
छीन लिया हर रंग ,जीने का ढंग ,करके बेरंग हुआ बदरंग ,
बहुत बेजा हरकत उसपर माफीनामा ,,,सरकार का रंग दिखाना ,
सजा को माफ़ कर .....उनकी राह को पुख्ता कर जाना ,
अनदेखा कर दर्द को सरेबाजार जीवन को नर्क बना जाना ,
तन के साथ मन को जीवन से जीते जी जुदा कर जाना ..
हठधर्मी बिन कारण ही बलात बलात्कार से बेहतर है मर जाना ..
वो छू गए तन को दुनिया तार तार करती है मन को ,
फिर "वो " हर रोज हर पल सिर्फ मरती है ..जीते जीते जीवन को .- विजयलक्ष्मी

सुधार जरूरी है शुरुआत हों संस्कारों से ,
गृहधर्म निर्वाह ,कर्म और विचारों से .
हिस्सा हम भी है तुम भी इसी समाज का ,
शुरू करना सुधार है अपने ही परिवारों से.
क्यूँ चूक गए हम और चूक कहाँ हुयी हमसे ,
देखना होगा हमे खुद के व्यवहारों से .
गलती करें और गिर के सीखे जरूरी नहीं है ,
दूसरे को गिरते देख सबक ले किरदारों से
खरीद फरोख्त का बाजार है खुला हे नुक्कड़ पे ,
क्या गलत सही सीखना होगा गुनहगारों से .
जानकर दलीलें क्या वक्त बदल जायेगा ...
इंसानियत का रंग भर,सीख लेना समाज के ठेकेदारों से
.
..!!.- विजयलक्ष्मी


इन्साफ कब मिलेगा :--
..
लटकते चमगादड़ बोले हम तो लटके है उलटे ,
तुम्हे भी उलटे ही लटकना होगा ,,
गहन अँधेरी रात है बहुत लम्बी दूर तलक ,
मंजिल की तलाश में तन्हा भटकना हों ,,
सरोकार किसका किससे है कोई नहीं जानता ,
कानून बना है , दर दर भटकना होगा ,,

बहुत सटीक न भी फिर जितने बने है पाने उसे ,
वक्त ले गलियारों में भटकना होगा ,,

हों सकता तुझे जीते जी इन्साफ न मिले यहाँ ,
रूह को वंशजों संग भी लटकना होगा ,,
न्याय की लड़ाई में इंसाफ की खातिर देख लो ,
हकीकत ,एक जन्म तो लटकना होगा ,,.
------------ विजयलक्ष्मी


पूरी रात तुम्हारे अंगन में कट दी..
नजर तुम्हे ढूंढती रही ..तुम नहीं मिले 
कब लौटकर आये ...तुम,,
यहाँ इन्तजार कर रहे  
दोनों को इंतजार था ..जागकर कटती हैं रात 
दिन में कौन सोता है एक बात पूछूं   तुमसे ..
ये प्यार ऐसा क्यूँ होता है .----------- विजयलक्ष्मी



सोचा न था यूँ भी यूँ ही ,
दरकार उनकी भी यूँ ही .
दिल माना न पराया यूँ ही ...
जिंदगी कटेगी अब तन्हा यूँ ही ..
चले साथ भी वो यूँ ही 
खो गए यूँ ही ,
जिंदगी तुम चली यूँ ही. 
कहाँ कोई मुलाकात यूँ ही ,
वक्त की हर बात यूँ ही .
और यूँ तो यूँ है यूँ ही ,
कह ना सके यूँ ही 
समझे भी क्या यूँ ही ?
और फिर भी यूँ ही है यूँ ही 

.और कट गयी रात यूँही .------------ विजयलक्ष्मी


जमाने की नजर से नहीं ,
अपनी दुनिया की नजर से देखो तुम .
वक्त ने क्या दिया है सोच ,
टेडी सी नजर जमाने पर तो रखो तुम .
शक भी खुद पर ही क्यूँ 

अपनों की तो सीधी सी खबर रखो तुम.
पूछना आईने क्या भला ,
आइना कहेगा तो क्या सुन लोगे तुम.
------------ विजयलक्ष्मी




चलो मेघा बरसा तो..
सहर से अब तक..
अजब सा था 
जैसे हवा भी रुकी हों मेरे गांव की ...
शायद कुछ राहत हों जाये ..
बरस जितना चाहे बरस ..
बहा कर ले जा ...जो भी बहा सके ..
पहाड़ ,सडक ,पेड़... नदिया ...पुल
नहीं ....पूरी कायनात ..
काश !!
किन्तु ....ये तो ..रुक गया ,
ठहर गया ...सहम सा गया है..
शायद बदल गए बादल भी.....
मौसम भी ... बहुत शोर है ...
किन्तु ....कहाँ ??
सब भीग रहा है,
सिर्फ मेरा मकान नहीं..... .-- विजयलक्ष्मी



उम्र के इस पड़ाव तक ..
जाने कितने घरों की इंटें इन्हीं कंधों पर ढो डाली ,
कितने रईसों के आलिशान बंगलें बन गए..
इन्ही हाथों की मेहनत से ..
नहीं बन सका तो एक अदद छत ..
जिसमे मैं भी रहा सकता कभी ...
कुछ लम्हे ही सही ..
इस छान से टपकता पानी तो रोक नहीं पाया ..
जीवन भर ढोया किया बोझ कंधो पर औरों का ..
अब मुनिया की शादी सुनिया का गौना ..
रानी की किताब बचुआ की कमीज ..
एक बिंदिया का पत्ता ...लाल सा परांदा ..
काजल की डिब्बी ..चूड़ी पायल बिछुआ ..दो धोती...
कैसे होगा इतना काम ...
सालता है मेरा मन मुझको कैसे ..
ओह ..ये मुआ..छान से टपकता पानी ...
सोचने भी नहीं देता ....
पहले छान ठीक करनी होगी ..
और मेरी छत ...
महज एक "सपना " .-- विजयलक्ष्मी




धार तो तेज होनी चाहिए ...
अगूंठे एकलव्य के... या द्रोण के कटने चाहिए ,
अर्जुनों की तलवार गर चमक है तो चलेगी साथ में ..
जेब वर्ना गद्दीनशीनों की कटनी चाहिए ..
मैल भर के जो उठाये आँख को ..शूल उसके पार उतार दे.... चलो 
वैश्यों की दुकानों को ताला लगा ...कर्म बदल देते है चलो ..
घूसखोरों की औलादों को बाप के साथ.. जेल की हवा तो दिखा क्या कहूँ ....
दरोगा भी जिगर पे पत्थर होना चाहिए ....
द्रोण को कला गर आती नहीं ...रोटी फिर क्यूँ चाहिए ..
आदमी को आदमी की बोटी भला क्यूँ चाहिए..
देख ले सम्भल जा अभी ...वक्त अभी निकला नहीं ..
सूरज को कह से निकल अब ..समय बदलना चाहिए ज्ञान का दिया ..
अंधेरों भी जलना चाहिए चल ,
बर्तनों की खनक कान बर गूंजेगी जरूर लेखनी की धार ... तलवार बन भाजेंगी .. जरूर
एकलव्य अंगूठे क्यूँ दे भला अपने ....
जेब से नोटों की गड्डी...फांसी लगनी चाहिए ..
चल उठ ,साथ चलेगा क्या ....रौशनी कोई दीप से तो जलनी चाहिए 
आग जरूरी है तू जला मैं जलाऊँ ...आग वैश्या बनी दुकानों में लगनी चाहिए ..
क्रांति ...की आग ..हाँ अब तो ..लगनी चाहिए .------------..विजयलक्ष्मी


शब्दों का काफिला निगाह में नीलामी की गाय ,
दर का वफादार कुत्ता ..बैठा है उम्मीद में ..
मेरे कच्चे घर की छत .. उड़ जाती है तूफ़ान में ..
क्या सरकार को इसकी चिंता बाकी है ..

या सरकार बहरी हों चुकी आज और बहने दे ...
बाढ़ में जैसे गंगा ने बहा दिया ..बाँध न बंधेगा ..
कितनी बार नापतौल बाकी करेगी सरकार ...या
बिलकुल निकम्मी है पर इतनी उम्मीद नहीं थी ..
क्या कह सकते है घोटालों का परचम लहराया है हर ओर ..
और उसपर मिजाज भी कुछ बदले से है आज सरकार के ..
सुना है कसाब को फांसी हों ही जायेगी ..
चलो मुसलमानों को ...हाँ वही जो चुप बैठे है सजा मिलने से सबक मिलेगा ..
शायद समझ जाये कि जनता ने किस से उम्मीद लगाई ..
चुप्पी ..बता रही है कि समन्दर का उफान देख ...
किसी दरख्त के नीचे पनाह लेली ...और बारिश का आनंद लिया जा रहा है ..
उम्मीद तो नहीं दोस्तों से ऐसी पर बदलता वक्त क्या पता ?
आज ....सूरज भी रंग बदल रहा है ...न मालूम धरती का क्या हश्र होने वाला है ..
उसपर राम भजन का चिप्पा ...चस्पा दिया हैं .---------- विजयलक्ष्मी



रौशनी सूरज की मिलती बराबर ,
फिर भी मौसम बदले है धरा पे अलग है ,
बगीचे के फूलों की रंगत जुदा है ..
धरती पहनती बाना भी अलग अलग है ,
पहाडो पे बारिश बरसके भी ठहरती नहीं है ,

समन्दर मगर भरता रहता सदा ही ,
झरना गिर के भी उठता ,नहीं मौत आती ,
तालाब जल निर्मल धारण करता नहीं है ,
गंगा जल रख लो मृत्यु पर्यन्त किन्तु कभी भी सड़ता नहीं ,
विश्वास दुनिया अगर खा गयी तो ,कोई भी सिद्धांत काम करता नहीं ,
माना गिरेगी हर वस्तु जमी पर ...
स्वाभिमान अच्छा है मौत से भी मगर ..गुरुर कभी खुद से गुजरता नहीं ,
सादगी जिंदगी में जितनी समझ लो ....
सरल से सरल पर कोई मैल रुकता नहीं ,
आजमाइश की कोशिश भुन्गो की दुनिया ..
सत्य की आंच पे जले बिन बचेगा नहीं ,
वहम से भरी है दुनिया ये सारी ,
आइना कभी वहम करेगा नहीं .
जन्नत का रंग देखा किसने है भला ...
मरेगा नहीं जो वो जन्नत देखेगा नहीं
||.------- विजयलक्ष्मी



माना धन बहुत कुछ हुआ पर चरित्र नहीं रच सकता ,
काजल की कोठरी दुनिया माना कोई भी नहीं बच सकता ,
परखना खुद का , दुनिया धोखेबाज है कुछ नहीं हों सकता ,
सम्भलकर रखना है हर कदम कोई भी छल सकता है ,
व्यापर हों गया भाव का ,व्यापरी हुआ चरित्र है ....

बे सख्ता बे हिसाब है समाज सच में काला हो चुका ..
बहुत बिगड़ा हुआ मिजाज है ,धन की भूख निगल रही इंसान को ...
शक्ल इंसान की दे रखी है हैवान को ,
हर रंग मिलता है ये भी सच है ....हर कोई हर किसी के लिए बुरा नहीं होता ,
क्या डाकू किसी बहन का भाई नहीं होता ,
तवायफ भी बाजार में बैठी है अगर .......हर कोई खरीददार नहीं होता ...
ईमान ,क्या खुद किसी का कोई ईमान नहीं होता ...
ईमान खो गया भरोसा खत्म है हर किसी का इंसान से ...
एक मछली से सदा क्यूँ बदनामी.... क्यूँ लक्ष्मीबाई से आबाद नहीं होता ...
चल छोड़ दुनिया का मेला है हर शख्स एक समान नहीं होता
.--------- विजयलक्ष्मी




नजरिये शब्दों की ही गिनती कर बैठे..
वक्त के धार को जोड़कर देखा होता 
खुदाई नुमाया नहीं जिंदगी मालूम है ,
शब्दों को कभी माप कर भी देखा होता .
कुछ पल को सही मुस्कुराकर ए वहम ,
इस नायब सी जिंदगी से मिलकर देखा होता .-विजयलक्ष्मी





तुमने पूछा
जब तुम नहीं रहोगी
तो कौन सी कविता
लिखूँगा मैं ?
उस पर तुम्हारी जिद
अभी सुना दो
जाने के बाद कैसे पढूंगी मैं
उफ़ ..........आखिर ले ही लिया इम्तिहान मोहब्बत का
आखिर ज़िन्दा ही आग लगा दी चिता को
और देखो अब सिंक रहा हूँ मैं
तुम्हारे तपाये तवे की तपिश में
कितना दुरूह है ये ख्याल
कभी सोचा तुमने ?
और मुझे कह रही हो
लिखो वो जो तुम तब मह्सूसोगे
जो कल होना है
वो आज महसूसना .........क्या इतना आसान है?
उन पलों से गुजरना
जैसे दोज़ख की आग में जल रहा हो कोई
फिर भी तुम्हारी ख्वाहिश है ना
तो कोशिश जरूर करूंगा
शायद इसके बाद ना फिर कभी कुछ कह सकूंगा
शायद तुम्हारे जाने के बाद भी नहीं ...........
शायद आखिरी कलाम हो ये मेरा
मेरी मोहब्बत के नाम
चलो बाँध देता हूँ बाँध आखिरी मोहब्बत के नाम

जाने के बाद……………
मेरी खामोश मोहब्बत की दस्तखत थीं तुम
जिसमे मैंने पलों को नहीं संजोया था
नहीं संजोया था तुम्हारी हँसी को
तुम्हारी चहलकदमी को
तुम्हारी उदासी या खिलखिलाहट को
नहीं थी तुम मेरे लिए सिर्फ मेरी प्रियतमा
जीवन संगिनी या कोई अप्सरा
जो संजो लेता यादों के आशियाने में तुम्हें
ये तुम जानती थीं तुम क्या थीं मेरे लिए
थीं क्यों कहूं तुम क्या हो मेरे लिए
क्योंकि तुम गयी कहाँ हों
यहीं तो हो ............मेरे वजूद में
अपनी उपस्थिति का अहसास करतीं
तभी तो देखो ना
सुबह सुबह सबसे पहले
प्रभु सुमिरन , दर्शन के बाद
रोज लग जाता हूँ उसी तरह गृहकार्य में
और समेट लेता हूँ
सुबह का दिव्य आलोकित नाद अपने अंतरपट में
बिल्कुल वैसे ही
जैसे तुम किया करती थीं
तो बताओ कहाँ जुदा हो तुम
जो सहेजूँ यादों के छोरों में
दिन के चढ़ने के साथ बढ़ता ताप
मुझे बैठा देता है अपने पास
जहाँ मैं अपनी कल्पनाओं को उड़ान देता हूँ
और पता ही नहीं चलता
वक्त खुद गुजरा या मैंने उसे रुसवा किया
क्योंकि मेरे पास आकर
वक्त भी ख़ामोशी से मुझे ताकता है
कि कब सिर उठाऊँ और उसे आवाज़ दूं
मेरी साधना में बाधा नहीं ड़ाल पाता
तो खुद मायूस हो ताकता रहता है मुझे
बिल्कुल वैसे ही जैसे जब तुम थीं
तो यूँ ही साध्नामग्न हो जाती थीं
और वक्त तुम्हारे पायताने पर
कुलाचें भरता रहता था
बताओ फिर कैसे वजूद जुदा हुए
तुम मुझमे ही तो सिमटी हो
कोई भी कड़ी ऐसी नहीं जो भिन्न हो
फिर कहो तो कौन किसे याद करे
यहाँ तो खुद को ढूँढने निकलता हूँ
तो तुम्हारा पता मिल जाता है
और मैं तुम्हारे घर की चौखटों पर
अपने अक्स से बतियाता हूँ
पता ही नहीं चलता
कौन किससे बतिया रहा है
सुना है दीवाना कहने लगे हैं कुछ लोग
मगर नहीं जानते ना
तुम मेरी लिए सिर्फ प्रेयसी या पत्नी ही नहीं थीं
बल्कि मेरी प्रकृति बन गयी थीं / नहीं बन गयी हो
तभी तो कब कोई भी वजूद
अपनी प्रकृति बदल सकता है
और सुना है इन्सान का सब कुछ बदल सकता है
मगर प्रकृति नहीं ..........स्वाभाविक होती है
शायद तभी तो नहीं खोजता तुम्हें
नहीं ढूँढता तुम्हें घर आँगन में
तस्वीरों के उपादानों में
यादों के गलियारों में
तन्हाई की महफ़िलों में
क्योंकि जुदा वजूदों पर ही दस्तावेज लिखे जाते हैं
और तुम तो मेरी प्रकृति का लिखित हस्ताक्षर हो .........ओ मेरी जीवनरेखा !!!!!



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