Thursday, 30 October 2014

" ................. अन्यथा अकविता समझ लेना .."

" कविता भूखे किसान का क्रन्दन भी है 
कविता माँ भारती का वन्दन भी है 
कविता देश-प्रेम का चन्दन भी है 
कविता आगत का अभिनन्दन भी है 
कविता जिन्दगी और मृत्यु का अटूट बंधन भी है 
कविता यदि नैसर्गिक है तो कविता है अन्यथा अकविता समझ लेना
जिसमे अहसास शब्दकोश से उतारे जाते है
बड़े बड़े भारी भारी शब्द उकेरे जाते है
जिन्हें साहित्य के शिखर की तमन्ना है वही लिख पाते हैं
हम जैसे तो साँस के साथ गुनगुनाते हुए जीवन को भी नहीं कह पाते है
माँ की आँखों में ममता तो होती है डर भी होता है
माँ पत्थर सी दिखती जरूर है उसमे एक दिल भी होता है
वो माँ भारती हो या बच्चे की माँ ...
उसका हर गुजरता लम्हा कविता होता है
जब वो बिक जाती है बच्चे के दूध की खातिर
या मार डालती है बिटिया की इज्जत की खातिर
कविता तो जिन्दगी है जिन्दगी के साथ बहती है
कविता न निरपेक्ष न सापेक्ष बस कविता ही रहती है
"---- विजयलक्ष्मी 

Tuesday, 28 October 2014

" ममता देखे बावरी न चादर न सोढ "

" एक तरफ भूखे बिलख बच्चे सोते गगन को ओढ़ 
तीन दिन में फिल्म पर मिलते इक सौ आठ करोड़,

इक आँख में नींद नहीं .. बेघर बैठे हैं पैर सिकोड़ 
कुछ नींद खाए बीमारी घर की कीमत साठ करोड़

बेसुध सोये पड़े ममता देखे बावरी न चादर न सोढ
भूख नींद लालच में दबे दौलत जिनपे लाख करोड़ " --- विजयलक्ष्मी 

Sunday, 26 October 2014

"बहुत प्यास है समन्दर की देखो "

ए जिंदगी चल वक्त हों चला ,
डूबती उतरती है कश्ती नदी में ||

बहता है जो बीच धारा सा बनके ,
लहरों का उठना गिरना नदी में||


बहुत प्यास है समन्दर की देखो,
यादों का झरना मिलता नदी में ||

खिलते गुलों सा तसव्वुर को देखा ,
कमल भी देखा खिलता नदी में ||

बचकर भला कैसे पार हम उतरते,
पतवार छूटी, ख्वाब बहता नदी में|| .....विजयलक्ष्मी 

" मुर्दा शब्दों को जिन्दा बस्ती नहीं मिला करती "

" कुछ वृक्षों पर कभी ओस नहीं गिरा करती ,
कुछ वृक्षों की डाली कभी नहीं फूला करती ||


कुछ कंटक चुभा करते है कदम कदम 
कुछ जख्मों पर पपड़ी नहीं जमा करती ||


कुछ बिखरी पड़ी टूट शाख से इधर उधर
पत्ती पीली होकर गिरी,, नहीं जुडा करती ||


धारा बह निकली थी पहाड़ो से वक्त और था
बहती धारा ..तालाब पर नहीं रुका करती ||


हूँ अदना सी बूँद, वजूद नहीं कुछ भी मेरा
टूट गिरी इक बार नजर से नहीं उठा करती ||


न महक है न रंग.. बेरंग स्याही कलम की
मुर्दा शब्दों को जिन्दा बस्ती नहीं मिला करती |
| "--------- विजयलक्ष्मी 

Friday, 24 October 2014

" गजल शब्दों का मकां होता तो शब्दकोश कम कैसे "

" वो कोई और होंगे चेहरे पे गजल कहने वाले ,
उजला मन चांदनी छलकी तब गजल बनती है

दौलत की दुनिया में सुना है बिकती हैं गजले
रंज की महफिल गरीबों की भूख गजल बनती है

लबों की लाली पर गजल को न कहना मुझको
लहू बिखरता सरहद पे हौसले की गजल बनती है

बरसती बरसात पर लिखी गजले गजलकारो ने
सहमी वो लडकी दुनियावी निगाहों से गजल लगती है

गजल शब्दों का मकां होता तो शब्दकोश कम कैसे
भीगते हैं अहसास जब दिल के गजल बनती है
"--- विजयलक्ष्मी