Tuesday, 25 September 2012

ख्वाब ले चले हम संग ,

मुस्कराया जाये सहर के सूरज की मुस्कुराहट के संग .
बिखेरे जाएँ धरा पर कुछ इन्द्रधनुष से खूबसूरत से रंग .
रंगीन हों जाये कायनात सारी क्यूँ बहे दरिया उदासी की .
प्यास का क्या है उठने दो कुछ बहक यूँही लहरों के संग .
सहर ए सफर है चल गुनगुना लेते है गुमनाम से गीत .
कुछ गगन के कुछ धरा की खातिर,ख्वाब ले चले हम संग .
आओ मुस्कुराये की मुस्कुराने लगे ओस सी तहरीर गुलों के संग .-- विजयलक्ष्मी 

बस एक गजल बनती है .

सियासत की चाल जब रियासत में बंटती है ,
कोई राह जब दिल ए रहगुजर से गुजरती है ,
खुशबू सहरा की जब कायनात से गुजरती है ,
रेतीली आंधियां रहगुजर की समन्दर बनती है ,
हस्ती कोई खुदी में समाकर जब नजर डूबती है ,
खलिश तपिश को छूकर जब बर्फ सी पिघलती है ,
सामां ए वफा बिखर कर राह से जब गुजरती है ,
वो जिंदगी जब जज्ब हों कर खुद में संवरती है ,
शब्दों की चुभन भीतर अहसास में उतरती है ,
चमक जुगनू की जब सूरज सी निखरती है ,

परवाना जले न जले चाहे मगर शमा जलती है ,
भीतर ख्यालों के हुक सी कोई दिल में पलती है ,
इज्जत के पर्दे से कोई आरजू सी उतरती है,
तवायफ भी जब उस रंग से खरी हों निखरती है ,
दर पे दर्द के पहरे और एक आवाज सर्द बिखरती है ...
कहते है..सुना हमने भी ,बस एक गजल संवरती है .-- विजयलक्ष्मी

Thursday, 20 September 2012

मुट्ठी की रेत ..


वक्त ए सकूं की क्या दरकार है अब ,
वक्त किसी के पास है ही कहाँ अब .
वो बहते दरिया ,मुट्ठी की रेत सी हम ,
बिखरा जो रिस कर समझ बिखरा अब .

-- विजयलक्ष्मी .

वट वृक्ष ...


हाँ वट वृक्ष का समूह सा खड़े है हम, जड़े गहरी है बहुत ,
वक्त का तकाजा है चुप रहकर करे इंतजार ए वक्त कोई ,
कौन मुकम्मल दरख्त की छांव से भटके नहीं ...धूप में ,
गुम न हों बेखबर सी जिंदगी के बेबस से सफर पे कोई .
हर मुक्कमल जहाँ मिले हर राह को ..पथ रंजित न हों 
न लहू गिरे कहीं धरती रक्तवर्ण रंजित निशाँ न पाए कोई . 
सभ्यता के देश में बिखरा न हों कोई चमन ..न बागबाँ ,
रूठ कर बिछड़ न टूटे सितारा अपने आसमानों से कोई .
.-- विजयलक्ष्मी

Wednesday, 19 September 2012

हम अभी भी कांच है ...

हम अभी भी कांच है न हीरा सा तराशा है किसी ने 
ये अहसास हुआ अब है जब खुद को तलाशा है हमने ..
जख्मों को लिखना औरों के खुशी ढूंढें जमाना भी गर 
मुकम्मल जहाँ बहुत दूर फलक पर बसा है कहीं जाकर ..-- विजयलक्ष्मी