Sunday, 14 June 2015

" क्या त्याज्य स्त्री ही कुलटा और कुलक्षिणी होती है "

हमारा तथाकथित सभ्य समाज किसी भी गलती पर हर अंगुली औरत की तरफ ही उठाता है. .......चाहे वो चारित्रिक हो या वस्त्र सम्बन्धी...या विचार को लेकर.या स्त्री के अस्तित्व की लड़ाई....क्यूंकि पुरुष कोई गलती नहीं करता और हर स्त्री गलतियों का पुतला है.....और हरपुरुष दूध का धुला........ और घर की अन्य सभी तथाकथित औरते कुलीन |
क्या त्याज्य स्त्री ही कुलटा और कुलक्षिणी होती है........मसलन सीता का पुन: वनवास उसी का हिस्सा था.......और जिम्मेदारी भी औरत पर....... तलाक के समय प्रयास होता है बच्चे माँ के ही साथ रहे..... बस एक सवाल पूछू भगवान बने पुरुष पति से ...क्या उस बच्चे को माँ के घर से लाई थी..... स्त्री एकाकी  होकर यदि बच्चे का पालन कर  सकती है तो  पुरुष क्यूँ  नहीं क्यूँ न वंशबेल को  उसकी जड़ के साथ  छोडकर निकले स्त्री  स्वयम को बांधकर पुरुष को आजाद क्यूँ करे ..... जिससे वो एक और कुँवारी कन्या से ब्याह कर सके ?...... क्या उसे जीवन यापन का उतना हिस्सा मिलता है जिसकी हकदार है वो.... क्या उत्पन्न परिस्थितियों के लिए केवल स्त्री ही जिम्मेदार होती है...... और यदि स्त्री इतनी सक्षम है...तो..समाज उसे बंधक बनाकर पर्दे में क्यूँ रखता है...क्यूँ डरता है स्त्री को पूर्ण इकाई मानने से....कमतर क्यूँ आंकता है ,,उसे गृहस्थ में बराबर सहयोग न करके भी सामाजिक दिखावा क्यूँ करता है ....सच बोलना अपनी अर्धांग्नी को सही मायने में अर्धांगनी कब कब समझा ? .....चलो यही पूछ लो खुद से क्या कभी सच्चे दोस्त की तरह सुना और समझा ? ......... ईमान से झांकना खुद में
आइना बनने की चाहत में रंग लिया इक-छोर
खुद-पर नजर जाती तो जाती-क्यूँकर भला ---- विजयलक्ष्मी 

Monday, 8 June 2015

" मुहावरो के आधुनिक अर्थ...( वाह क्या दुश्मनी है )"

बदलते परिवेश और मानसिकता के साथ शब्दों के अंदाज भी बदले जा रहे हैं ....आप भी आनन्द लीजिये अगर ले सकें ...इस नई सोच का ---
मुहावरो के आधुनिक अर्थ...( वाह क्या दुश्मनी है )
1. सुख की जान दुःख में डालना = शादी करना
2. आ बैल मुझे मार = पत्नी से पंगा लेना
3. दीवार से सर फोड़ना = पत्नी को कुछ समझाना
4. चार दिन की चांदनी वही अँधेरी रात = पत्नी का मायके से वापस आना
5. आत्म हत्या के लिए प्रेरित करना = शादी की राय देना
6. दुश्मनी निभाना = दोस्तों की शादी करवाना
7. खुद का स्वार्थ देखना = शादी ना करना
8. पाप की सजा मिलना = शादी हो जाना
9. लव मैरिज करना = खुद से युद्ध करने को योद्धा ढूंढना
10. जिंदगी के मज़े लेना = कुँवारा रहना
11. ओखली में सिर देना = शादी के लिए हाँ करना
12. दो पाटों में पिसना = दूसरी शादी करना
13. खुद को लुटते हुऐ देखना = पत्नी को पर्स से पैसे निकालते हुए देखना
14. पैरों तले जमीन खिसकना = पत्नी को साक्षात सामने दिखना
15. शादी के फ़ोटो देखना = गलती पर पश्चाताप करना
16. सर मुंडाते ही ओले पड़ना = परीक्षा में फेल होते ही शादी हो जाना
17. शादी के लिए हाँ करना = स्वेच्छा से जेल जाना
18. शादी = बिना अपराध की सजा
19. बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना = दुसरो के दुःख से खुश होना
20. साली आधी घर वाली = वो स्कीम जो दूल्हे को बताई जाती है लेकिन दी नहीं जाती.

" और वक्त की आंख में डालकर आँख आइना बन जाओ "

कैफियत न पूछ दिल के हाल बुरे है ,,
हम भूलते नहीं उन्हें वो याद नहीं करते 
जिन्दा हैं बता देना ए हसरत उनको 
बात इतनी सी हम फरियाद नहीं करते
--- विजयलक्ष्मी



न द्वंद है न कोई विरोधाभास है ,
धरती गगन का आपसी विश्वास है 
हरित है धरती क्यूंकि प्रकाश है 
धरती के परीत: पसरा आकाश है
--- विजयलक्ष्मी


सुबह सवेरे भोर हुए सूरज उग आया खिड़की पर बोला उठ जाओ 
जागो खोल आँख जीवन पथ पर आगे और आगे बढ़ जाओ 
वीर बनो कायरता का बाना न खुद ओढो न भविष्य को उढाओ 
समय ठहरता कब है जो तुम ठहर गये .. सोच समझ कर बतलाओ 
क्रांति की भ्रान्ति नहीं मशाल न जल सके गर कोई इक दीप ही जलाओ 
झूठ दिखावे की दुनिया में कभी तो सत्य के चेहरे को भी सामने लाओ
छल प्रपंच को छोड़ उतारो झूठ से बना बुरका सत्य से पर्दा उठाओ
कब तलक ठहरे रहोगे मन बीथि में लगे विचारों के जाम में कदम आगे बढाओ
नव पल्लव सम नवप्रभात के नव सूरज सा प्रथम कदम आगे बढाओ
बीनकर दीप से जलते सितारे अँधेरे के आंचल में सजा नव गीत गाओ
पुष्प से खिलकर मन सुगंधी को जीवन पथ पर महकाओ ..
और वक्त की आंख में डालकर आँख आइना बन जाओ
----- विजयलक्ष्मी


Saturday, 6 June 2015

" वो कहाँ गये जिन्हें जख्म मिले देह पर और आत्मा पर छाले थे "

खबरनवीसों सोचो और पढो खबर अख़बार के हवाले से ,
क्यूँ आजादी की डायरी के पन्ने कुछ ही नाम सम्भाले थे ,
वो कहाँ गये जिन्हें जख्म मिले देह पर और आत्मा पर छाले थे 
घर दर छूटे जिनके जिन्दगी के भी पड़े लाले थे 
फखत कुछ क्यूँ बाकी जो आजादी से सत्ता सम्भाले थे ..
कौन है जो लगा ..उन्हें ढूँढने के प्रयास में
दफन कर दिए बलिदानों के नाम तक इतिहास में
क्या नेहरु गाँधी ही बस आजादी ले आये है,
उनका वारिस भी तो ढूंढो जो अपनी जान गंवाए हैं
कितने वीरो और वीरांगनाओ ने बरात चढाई आजादी के साथ
और सजाई सेज सुहाग मातृभूमि के साथ
सो गये जो वतन के मतवाले थे ..
इबादत ए इश्क ए वतन...जो भारत पर मिटने वाले थे
उनका क्या देखे ...लड़े या नहीं मगर वसीयत में गद्दी सम्भाले थे
--- विजयलक्ष्मी



Friday, 5 June 2015

बोलो पर्यावरण दिवस की जय



पर्यावरण दिवस ..." हर प्रयास सार्थक है "||
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पर्यावरण दिवस ...इच्छा के बाद भी एक वृक्ष सार्वजनिक स्थान पर न लगा पाने का अफ़सोस ...लेकिन अफ़सोस क्यूँ .....पर्यावरण को सुरक्षित रखने के तो बहुत उपाय है ...आप सहयोग कीजिये ...हर छोटा उपाय ही बड़े उपाय को और भी बड़ा करता है ,,,एक प्रयास ..पोलीथिन का प्रयोग कम से कम हो ..न हो तो बहुत अच्छा ,,,अपने घर के टेरेस पे ही सही कोई छोटी सी पौध गमले में ही क्यूँ न ..लेकिन लगाइए जरूर ...घर भी सुंदर लगेगा और पर्यावरण के समन्दर में एक बूँद ही सही आपका सहयोग भी होगा ...अपने घर के आसपास के किसी भी हरे वृक्ष को कटने न दे ...कोई वृक्ष पानी के आभाव में है ..कुछ नहीं तो ..उसकी प्यास बुझाकर उसे मरने से बचाइए ...पंछियों के लिए जल रखिये ...वो भी हमारे पर्यावरण का आवश्यक अंग है ...घर के भीतर उन वृक्षों को लगारण ये जो छाया में भी जीवन यापन कर सकते हैं ...ये सोचकर सार्वजनिक वृक्ष ही पर्यावरण में सहायक है हाथ पर हाथ धरकर न बैठिये ...हर कोशिश ..छोटी या बड़ी ..आप सभी का सहयोग अपेक्षित है .
घर में तुलसी का पौधा लगाइए ...जो वातावरण और सेहत दोनों का ख्याल रखेगा |
सोचिये जरा ...बड़ा प्रयास कर न सके और छोटा किया नहीं ...क्या उचित होगा ?........और मनाइए आप भी अपना पर्यावरण दिवस ...प्रयास का एक दीप जलाकर !!--- एक नागरिक ( विजयलक्ष्मी )



पर्यावरण दिवस .. 
मतलब कुछ सेमीनार 
मतलब कुछ वार्ता समाज के ठेकेदारों की 
मतलब कुछ गोष्ठियां 
मतलब कुछ जमावड़ा 
मतलब कुछ चिन्तन का दिखावा
मतलब लम्बी लम्बी बातें
मतलब वृक्षों की चिता पर उठती लपटों सी चिंता
मतलब गंदे नदी नाले
मतलब खनन पर सम्वाद
मतलब कुछ वाद कुछ विवाद
मतलब समय का सदुपयोग के कागज भराई
मतलब कुल मिलाकर मिडिया पर नया प्रपंच रचने का साधन
मसलन कुछ लकड़ी की टाल
कुछ समाज के ठेकेदार
कुछ जंगल काटने वाले
कुछ खनन के मतवाले
कुछ पीक थूकने वाले
कुछ बीडी सिगरेट का सुट्टा फूंकने वाले
कुछ लकड़ी के व्यापारी
कुछ नेता भारी भारी...करेंगे सारी तैयारी ,
दिनभर भाषण की मारामारी ,,,
एसी में विचार विमर्श दिखावे का परामर्श ,,जनता को सीख ...
रुपयों का खर्चा कागज पर चर्चा ,,
महज दिखावे को कोई एक आध पेड़ लगेगा ,,
चार दिन बाद बिन पानी बेचारा मरेगा ..,,
और पर्यावरण दिवस गुणगान अख़बारों और मिडिया में चर्चा का विषय रहेगा
असर ढ़ाक के तीन पात ..
बोलो पर्यावरण दिवस की जय ,,हिन्दुस्तान में तो ऐसे ही मनेगा ---- विजयलक्ष्मी




सम्भालों जिंदगी बदल रही है..
प्रकृति को मारोगे तो तुम जीवित रह पाओगे क्या .?. 
वृक्ष विहीन धरा न करो दोस्तों..
बिन वृक्षों के तो सोचो साँस भी ले पाओगे क्या .. ?
हरित बाना धरा का न नोचो ..
धरती को मिटा कर भला फिर तुम पाओगे क्या..?
वजूद धरणी का जरूरी है दोस्तों ..
अपने लिए भी प्रकृति तत्वों को न बचाओगे क्या ..?
क्या दे रहे हों अपनी वंश बेल को..
जीवन की जरूरत आक्सीजन भी दे पाओगे क्या ? - विजयलक्ष्मी