Saturday, 7 December 2013

कुछ महकती यादे ,

कुछ महकती यादे ,
कुछ अरमान
कुछ अहसास बहते लहू से 
कुछ खटखटाते से निशां 
पुरवाई संग नगमे 
कुछ आंसू की लकीरे 
और मुस्कुराते हम 
कब्र में झांक लेना तुम 
मिल जायेंगे गजल से 
जिन्दगी को लपेटे हुए 
मौत का दुशाला लिए साथ में
चंद मिटी सी लकीरे
हाथ में उभरे इन्तजार के पल
खुली आँखे दीदार को तेरे
झांकती घड़ियाँ जो ठहर सी गयी है पलकों पर
एक रोशन सी रौशनी
एक नाम गूंजता होगा हवाओ में
उनमे कांटे से चुभते हुए हम .- विजयलक्ष्मी

Tuesday, 3 December 2013

नाम लिखना उँगलियों से उनका

दामन ए हवा पर नाम लिखना उँगलियों से उनका ,
हमे सुनाता है क्यूँ तराना लेकर के ख्याल उनका .

बडी बेरहम औ बेसबब दुनिया है याद रखना ए दिल ,
सालता होगा यादों में बसना, सामने न आना उनका .

सुना जाती रुबाइयाँ... हवाएं रुखसार को छूकर हमे,
उनकी बात वो जाने हमे भाता है याद आना उनका .

हरसू ख्याल एक ही दर औ दीवार से टकराता क्यूँ है ,
क्यूँ नहीं जाता दिल से ख्वाहिश औ ख्याल उनका .

कितने बेगैरत से हों गए हैं हम ,वो पूछे न पूछे मगर ,
दिल चाहता ही नहीं भूलना और बनना सवाल उनका . ... विजयलक्ष्मी 

Monday, 2 December 2013

और क्या मांगूं किसी से

छापेखाने में भेजा था रात को ,छप कर ही नहीं आया ,

आज सहर का अखबार अब तलक घर मेरे नहीं आया ...विजयलक्ष्मी




ये जो तस्वीर है मेरी आँखों में ,वाबस्ता हूँ इसीसे ,

दर्द औ रुसवाई मिल चुकी और क्या मांगूं किसी से ...विजयलक्ष्मी  



परों को खोलना क्या वजन अब तौलना क्या ,

शुरू हो चुकी जंग खुद से खुद की झूठ बोलना क्या 


खोजते खबर रहे उम्रभर अब खुद की खौलना क्या 


मुहब्बत रास कब दुनिया को ,नफरत घोलना क्या .- विजयलक्ष्मी 

तब एक गजल संवरती है

सियासत की चाल जब रियासत में बंटती है ,

कोई राह जब दिल ए रहगुजर से गुजरती है ,


खुशबू सहरा की जब कायनात से गुजरती है ,


रेतीली आंधियां रहगुजर की समन्दर बनती है ,


हस्ती भी खुदी में समाकर जब नजर डूबती है ,


खलिश छूकर तपिश जब बर्फ सी पिघलती है ,


सामां ए वफा बिखरकर राह से जब गुजरती है ,


वो जिंदगी जब जज्ब होकर खुद में संवरती है ,


शब्दों की चुभन भीतर ,अहसास में उतरती है ,


चमक जुगनू की भी जब सूरज सी निखरती है ,


परवाना जले न जले चाहे मगर शमा जलती है ,


भीतर ख्यालों के हूक सी कोई दिल में पलती है ,


इज्जत के पर्दे से कोई जब आरजू सी उतरती है,


तवायफ भी जब उस रंग से खरी हों निखरती है , 


दर पे दर्द के पहरे और आवाज सर्द बिखरती है ...


कहते सुना हमने भी, तब एक गजल संवरती है .-- विजयलक्ष्मी

Sunday, 1 December 2013

कुछ आड़ी टेढ़ी सी लकीरे हैं ,

हथेली पर हमारी कुछ आड़ी टेढ़ी सी लकीरे हैं ,

पढने की चाहत बहुत रही जाने किसने उकेरी हैं.



उकेर कर मिला नहीं ,किसी के पास पता नहीं ,


अब हमारे नयन में तस्वीर और हिस्से फकीरी है.



कहीं किस्सा ए महफ़िल शोहरत न मिल जाये 


पढ़ लिया गर किसी ने भी ये दुनिया बेनजीरी है 



आँख का आंसू सुखाया हवा के मुहाने बैठकर 


आग लेकिन बुझ सकी न धुएं ने दुनिया बिखेरी है



रास्ता कोई सीधा पहुँचा कब जानिब ए मंजिल


वाबस्ता हर कदम मिलेगा हर राह भीड़ घनेरी है 



जिधर देखिये, भूख रोती है देह की आग झुलसाती 


मतलबी आपाधापी में इन्साँ ने दुनिया ही बिखेरी है .- विजयलक्ष्मी