Thursday, 6 September 2012

उसका हक है ..ये

सबको खुद की पड़ी है सच है क्यूँ सोचे कोई किसी की ,
पिंजरे की मैना रोये भी कैसे भला...सैयाद का हक है .
तू शिकारी है कर शिकार क्या लेना तुझको भूख लगी ,
जुनूं बोलता है जमीर भी खामोश है ये उसका हक है .-- विजयलक्ष्मी




होश आने तो दिया कर राहों पे खड़े थे हम ,
मालूम तो हों खत में लिखा क्या था ,
या खुदा रहम कर आज तो मेरे मालिक ,
जुनूं ए हक की इतनी तासीर तो न दिखा .विजयलक्ष्मी





रुक जरा इतना अफ़सोस तो न कर ,
यहाँ भी अँधेरा कर दिया तुमने ..
कोई रौशनी बाकी न छोड़ी कहीं ,
इतनी उदासी न भेज जरा ,
खबर देने में जल्दी कर दी तुमने .विजयलक्ष्मी 

निर्मल निर्झर वो झरना मेरे घर से बहता है ..

दर्द मेरा क्या लिखूँ जो जी लेती हूँ लिख देती हूँ ,
शब्द और लाऊं कहाँ से  ,छू लेती हूँ ,लिख देती हूँ ,
हाँ ताशे से बजते है ढोल ,कानों को बंद कर लेती हूँ ,
जी लेती होऊँ  वो लम्हा जब दर्द टूट कर बहता है ,
मेरे दरके बराबर से भी एक दर्द का दरिया बहता है , 
तट पर दुनिया बैठी जिसके स्नान रूह का रहता है ,
निर्मल निर्झर सा वो झरना मेरे घर से ही बहता है ,
हाँ टूटते टूटते जिस दिन दुनिया से जाना होगा ....
तब कह देंगे उस खुदा से हम अकेले बिलकुल नहीं है ,
एक फरिश्ता है ,मेरे संग तेरे साथ.... उसी घर में रहता है ,
उससे मुझको मिला एक बार , वह भी मेरा साथ चाहता है .- विजयलक्ष्मी

मौत पक्की थी मौत लेकर ...

उतार फेंको अब गद्दी से ,जुगाडदारों को क्यूँ सम्भाले हों 
पिछले दरवाजे से घुस चुके है उन्हें भी धक्का देदो ,
पहचानों, मार डालो , जो अपनी औकात भूल बैठे है,
हिमाकत कैसे हुयी कैसे ,कोई जयचंद होगा घर में ,
या विभीषण जो अपना उद्धार चाहता हों धरा पर ,
मौत ने परचम लहरा दिया ,अल्टीमेटम मिला बर्बादी का ,
शिखंडी भी छिपकर वार करता है ,सामने आ लम्बाई बता दूँ ,
भुनगा सा चिढता क्यूँ है ,न मालूम किसका क्या खाया लेकर ,

हम अनजान रही थे अपनी डगर ,बुलाया क्यूँ आवाज देकर ,
सुन ली तो चैन नहीं न सुनते मौत पक्की थी मौत लेकर ,
मिलन की चाह भला क्यूँ ,न देखा न सुना भाला है कभी ,
झूमते थे पवन संग जब खोए कैसे भला अच्छे थे तन्हा थे जब ,
रोते है , हंसते है ,मेरी मौत के फरमान पे दस्तखत भी हुए अब ,
अहसास ए मतलबपरस्ती हुआ आज क्यूँ है,कौन सुनाएगा कथा,
इंसान जाने ,बेचैन है, मन डूब गया समन्दर से खारे जल में यथा.- विजयलक्ष्मी

अब क्यूँ परेशां है दिल मेरा ....

"छूता था पहले अपनापन,क्यूँ बेगानगी छूने लगी .
दुनिया मेरी आज देखा न जाने क्यूँ बदलने लगी .
रास्तों के स्याहपन भी अपने से ही अब लगने लगे .
रौशनी राहों की मेरी क्यूँ तन्हाइयों में बदलने लगी .
बरसात जो भिगोती थी पल पल ,वही सुखाने लगी .
मजलिसे चाहता था दिल घबराने लगा अब साथ से ,
कैसे बदलूं हालात ए दिल जब महफिले ही डराने लगी .
जहाँ तमन्ना बसती थी अपनी,वो बस्ती अब है लापता. 
उठता धुआं हर मोड पर अब ,राह ए सफर सताने लगी .
अब क्यूँ परेशां है दिल मेरा यूँ उजडती बसती देख कर, 
महक धुएं की शायद , राज ए दिल भी समझाने लगी . ""- विजयलक्ष्मी

Wednesday, 5 September 2012

ए मेरे मालिक

होश आने तो दिया कर राहों पे खड़े थे हम ,
मालूम तो हों खत में लिखा क्या था ,
या खुदा रहम कर आज तो मेरे मालिक ,
जुनूं ए हक की इतनी तासीर तो न दिखा .विजयलक्ष्मी